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राजनीति को परिभाषित करते आज के नेता, बदल रहे राजनीति के मायने

देश की राजनीतिक दशा व दिशा आजादी के बाद से परिवर्तित होते जा  रहे हैं। राजनीतिक भाषा अब दो अर्थी हो चली है। राजनीति का मतलब सेवा माना जाना अब दूर की कौड़ी साबित हो रही है। अब सिर्फ वोट की राजनीति बन कर रह गई है।हमारे कर्णधार सेवा शब्द का प्रयोग भाषणों में ही करते हैं। अगर सच में सेवा भाव होता तो शायद गोरखपुर में दर्जनों मासूमों की जान न जाती । दोष भले ही डाक्टरों व सिस्टम को दे रहे हैं, कहीं न कहीं आप भी हैं,हम भी हैं क्योंकि ये देश सेवा कम अपनी सेवा करने ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं। राजनेताओं की क्रियाकलापों से राजनीति का मायने ही बदल दिया है। धर्मनिरपेक्ष देश में कुछ तथाकथित राजनीतिक पार्टियों के तथाकथित नेताओं ने धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ कर हद ही कर दी है,संविधान की व्याख्या अपने ही नजरिए से करना शुरू कर दिया है। सम्वैधानिक नियमों की धज्जियां सरेआम उड़ाना उनकी शान में शामिल होता है। भ्रष्टाचार व अपराध की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। गांधी,सुभाष, भगत,सरदार पटेल के आदर्शों को याद उनकी जयंती व पुण्य तिथि पर या फिर चुनावी भाषणों में आते हैं। ये जरूर है कि उनके नाम को जप कर जनता को आसानी से वेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। पहले राजनीतिक अपना सारा जीवन देश व उसकी जनता  की सेवा में तन मन धन  लगाते थे। वही आज के नेता अपना सारा जीवन मोह व लोभ में लगा देते हैं। यही अंतर राजनीतिक परिभाषा ही बदल देते हैं। तब नेता अपने को जनसेवक के रूप में पेश करते थे और अब वीवीआईपी कल्चर  व जनता के भाग्यविधाता के रूप में में पेश करना पसंद करते हैं। मामला विल्कुल उलट है ,इसलिए राजनीतिक मायने भी बदल चुका है ।राजनीति करने का तरीका अब गांधी वादी नही रह गया है। इसी घटिया राजनीति के चलते देश की अखण्डता पर आंच आना लाजमी हो जायेगा। इसलिए राजनीति में धर्म, जाति, क्षेत्र वाद की कोई जगह नही होनी चाहिए। इस सबसे ऊपर उठकर देश का स्थान सर्वोच्चतम रहे। तभी देश,जनता व स्वयं नेता का भला होगा।
@नीरज सिंह

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